Wednesday, April 28, 2021

Nadi Class 4 By Shastri Dheeraj Pandey

 DDHEERAJ Pndey, [28.04.21 11:31]
🌹🌹 *ॐ*🌹🌹
*वक्रतुंड महाकाय कोटी सूर्य समप्रभा ।।*
*निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।*
 परिवार में उपस्थित सभी सदस्यों का स्वागत है।🌹🌹
आगे का अध्ययन शुरू करते है
बृहत पाराशरा होरा शास्त्र के शुरू में जब मैत्रीय जी ने पराशर जी से ज्योतिष जानने की इच्छा प्रकट की तो पराशर जी ने कहा
वक्षयामी  वेदनयंन यथा ब्रह्मामुखच्छुतम।।
 अर्थात वेद के नयन रूप इस शास्त्र का उद्देश्य मुझे ब्रह्माजी से प्राप्त हुआ है वह मैं यथावत रूप से आपसे कहूंगा।।
मेरा मेरा मानना है कि मूल पराशर होरा शास्त्र अत्यंत विशाल ग्रंथ था वर्तमान में जो उपलब्ध है उसमें अंतर है।
कौन श्रेष्ठ है कौन नहीं इसके तर्क का कोई अर्थ नहीं सत्य तो सत्य है यदि कोई कहता है की नाड़ी ज्योतिष पराशर का  एडवांस लेवल है तो यह उनका अपना विचार हो सकता है परंतु सत्य से बहुत दूर है ।

नाड़ी ज्योतिष तो पाराशर पूर्व ऋषियों के अनमोल सृष्टि है जिस धारा में एक और संयोजक पराशर है।।

ये था नाड़ी का इतिहास और जोतिष सम्बन्ध।

अब हम कुछ नाड़ी ग्रन्थों को कैसे फलित करते है उनको समझते है।

जैसे पहली नाड़ी शनि नाड़ी ग्रन्थ में किस प्रकार फलित किया गया है उसको समझते है
 शनि ग्रह के आधार पर फलादेश करने के लिए जो ग्रन्थ है उसे शनि नाड़ी कहते है
इस प्रकार सभी ग्रहो के नाड़ी ग्रन्थ है।राहु केतु को छोड़ कर क्यो की यहाँ छाया है।

समस्त नाड़ी ग्रंथ में शनि को कर्म का कारक माना जाता है किसी भी कुंडली में शनि ग्रह जहां बैठा हो उस राशि को लग्न मानकर फलादेश किया जाता है शनि नाड़ी के अनुसार

जुड़वा बचो में तो एक सरीखा आएगा

जुड़वा बच्चो की भी नाड़ी अनुसार शनि का फल बदल जायेगा

1  शनि कर्म शनि से चौथा हाउस शनि कर्म का स्थान।
2 शनि से सप्तम कर्म के स्थान में आए के पार्टनर को देखते हैं 
3 शनि से दशम स्थान आए के कर्म क्षेत्र में आपका बॉस और आपका सम्मान देखते हैं 
4 शनि से 11स्थान कर्म द्वारा आप का लाभ देते हैं

अब मैं एक लग्न चक्र उदाहरण के तौर पर डाल रहा हूं

इस कुंडली  में कर्म का कारक शनि कर्क राशि में बैठा है शनि के साथ चौथे सातवें और दसवें स्थान का संबंध है अब कैसा होगा जातक का कर्म स्थान ।

यहां शनि से चौथा भाव देखें अर्थात कर्क से चौथा यानी तुला राशि बताएगा कर्म स्थान के बारे में कि जातक जहां कर्म करेगा ।

वह स्थान कैसा होगा।
 फिर सप्तम स्थान को देखेंगे तो जातक के पार्टनर के बारे में पता चलेगा ।
फिर शनि से जब दशम स्थान को देखेंगे तो जातक के कर्मों के बारे में पता चलेगा ।
इस प्रकार शनि नाड़ी में शनि नाड़ी को लग्न मानकर फलित किया जाता है ।

इसी प्रकार सभी नाड़ी ग्रंथों में ग्रंथ के अनुसार उस ग्रह को लग्न मानकर फलित किया जाता है

अब बुध नाड़ी को उदाहरण स्वरुप देते हैं

बुद्ध को शिक्षा का कारक माना जाता है।
 कुंडली में बुध जहां होता है उससे चौथा शिक्षा का स्थान देखते हैं।
 पांचवा स्थान कॉलेज एजुकेशन देखते हैं ।
नोवा स्थान उच्च शिक्षा यानी पीएचडी आदि को देखते हैं।

इसी प्रकार शुक्र नाड़ी ग्रंथ में शुक्र धन और पुरुष के लिए स्त्री का कारक माना जाता है।
ये शनि नाड़ी के सिद्धांत है।हर नाड़ी का अपना अलग अलग सिद्धान्त है।
शुक्र कुंडली में जहां बैठा हो वहां से सप्तम स्थान विवाह तथा स्त्री का विचार किया जाता है ।
शुक्र से दूसरे भाव में बैंक बैलेंस देखा जाता है।
 शुक्र से ग्यारहवे भाव में धन का लाभ देखा जाता है।
 और शुक्र से चौथे भाव में वाहन सुख देखा जाता है।
इस प्रकार शुक्र नाड़ी का फलित किया जाता है
इसी प्रकार मंगल नाड़ी ग्रंथ में मंगल ग्रह जिस स्थान पर बैठा हो उसको लग्न मानकर फलित करते है।
मंगल से तीसरे भाव में छोटा भाई।
 मंगल से 11 वे भाव में बड़ा भाई।
 मंगल से छठे भाव में शत्रु और 
मंगल से चौथे भाव में भूमि सुख का वर्णन किया जाता है ।

इसी प्रकार सभी नाड़ी ग्रंथों में उन ग्रहों को लग्न मानकर फलित किया जाता है।

चंद्रकला नाड़ी में इन सभी नाड़ी ग्रंथों का अंश समाहित है।

इसलिए चंद्रकला नाड़ी के अध्ययन से हमें बहुत सी नाडी ग्रंथों द्वारा फलित करने की पद्धति का ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

आज के लिए इतना ही अब सोमवार की क्लास में सभी भाव के कारतत्त्वो पर विचार करेंगे और चंद्रकला नाड़ी का एक एक  सूत्र से फलित करना शुरू करेंगे।

 

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