DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:39]
🌹🌹 *ॐ*🌹🌹
*वक्रतुंड महाकाय कोटी सूर्य समप्रभा ।।*
*निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।*
परिवार में उपस्थित सभी सदस्यों का स्वागत है।🌹🌹
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:41]
अब थोड़ा कुंडली चक्र के बारे में जान लेते है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:42]
कुंडली वह चक्र है, जिसके द्वारा किसी इष्ट काल में राशिचक्र की स्थिति का ज्ञान होता है। राशिचक्र क्रांतिचक्र से संबद्ध है, जिसकी स्थिति अक्षांशों की भिन्नता के कारण विभिन्न देशों में एक सी नहीं है। अतएव राशिचक्र की स्थिति जानने के लिये स्थानीय समय तथा अपने स्थान में होनेवाले राशियों के उदय की स्थिति (स्वोदय) का ज्ञान आवश्यक है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:45]
हमारी घड़ियाँ किसी एक निश्चित याम्योत्तर के मध्यम सूर्य के समय को बतलाती है। इससे सारणियों की, जो पंचागों में दी रहती हैं, सहायता से हमें स्थानीय स्पष्टकाल ज्ञात करना होता है। स्थानीय स्पष्टकाल को इष्टकाल कहते हैं। इष्टकाल में जो राशि पूर्व क्षितिज में होती है उसे लग्न कहते हैं। तात्कालिक स्पष्ट सूर्य के ज्ञान से एवं स्थानीय राशियों के उदयकाल के ज्ञान से लग्न जाना जाता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:48]
लग्न को प्रथम भाव तथा उसके बाद की राशि को दूसरे भाव इत्यादि के रूप में कल्पित करते हैं1 भावों की संख्या उनकी कुंडली में स्थिति से ज्ञात होती है। राशियों का अंकों द्वारा तथा ग्रहों को उनके आद्यक्षरों से व्यक्त कर देते हैं। इस प्रकर का राशिचक्र कुंडली कहलाता है। भारतीय पद्धति में जो सात ग्रह माने जाते हैं, वे हैं सूर्य, चंद्र, मंगल आदि।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:52]
इसके अतिरिक्त दो तमो ग्रह भी हैं, जिन्हें राहु तथा केतु कहते हैं। राहु को सदा क्रांतिवृत्त तथा चंद्रकक्षा के आरोहपात पर तथा केतु का अवरोहपात पर स्थित मानते हैं। ये जिस भाव, या जिस भाव के स्वामी, के साथ स्थित हों उनके अनुसार इनका फल बदल जाता है। स्वभावत: तमोग्रह होने के कारण इनका फल अशुभ होता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:53]
पाश्चात्य प्रणाली में (1) मेष, (2) वृष, (3) मिथुन, (4) कर्क, (5) सिंह, (6) कन्या, (7) तुला, (8) वृश्चिक, (9) धनु, (10) मकर, (11) कुंभ तथा (12) मीन राशियों के लिये क्रमश: निम्नलिखित चिह्न हैं : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:55]
(1) बुध, (2) शुक्र, (3) पृथ्वी, (4) मंगल, (5) गुरु, (6) शनि, (7) वारुणी, (8) वरुण, तथा (9) यम ग्रहों के लिये क्रमश: निम्नलिखित चिह्न : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 तथा सूर्य के लिये और चंद्रमा के लिये प्रयुक्त होते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:57]
भावों की स्थिति अंकों से व्यक्त की जाती है। स्पष्ट लग्न को पूर्वबिंदु (वृत्त को आधा करनेवाली रेखा के बाएँ छोर पर) लिखकर, वहाँ से वृत्त चतुर्थांश के तुल्य तीन भाग करके भावों को लिखते हैं। ग्रह जिन राशियों में हो उन राशियों में लिख देते हैं। इस प्रकार कुंडली बन जाती है, जिसे अंग्रेजी में हॉरोस्कोप कहते हैं। यूरोप में, भारतीय सात ग्रहों के अतिरिक्त, वारुणी, वरुण तथा यम के प्रभाव का भी अध्ययन करते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:58]
अब थोड़ा नाड़ी का परिचय नाड़ी ग्रंथों का परिचय
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:01]
काका भुजान्दर नाड़ी, वशिष्ट नाड़ी, ईश्वर नाड़ी, चंद्रकला नाड़ी, ध्रुव नाड़ी, भृगु नाड़ी, नंदी नाड़ी पुल्लीपानी नाड़ी, सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी, कुंज नाड़ी, बुध नाड़ी, गुरु नाड़ी, शुक्र नाड़ी, शनि नाड़ी, लग्न नाड़ी, लगनाधिपति नाड़ी, सत्य नाड़ी, अगस्त नाड़ी, सप्त ऋषि नाड़ी ,ईश्वर नाड़ी आदी शामिल है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:01]
चन्द्रकला नाड़ी में इन सभी नाड़ियों का कुछ कुछ अंश शामिल है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:02]
ताड पत्र पर अंगूठे के निशान से जो विचार किया जाता था है उसमें 15 चैप्टर हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:07]
पहले अध्याय में साधारण जानकारी है
दूसरे अध्याय में धनो परिवार का फलित
तीसरे अध्याय में भाई-बहन और साहस का फलित
चौथे अध्याय में माता और सुख का फलित
पांचवे अध्याय में संतान का फलित
छठे अध्याय में रेड और शत्रु का फलित
सातवें अध्याय में विवाह का फलित
आठवें अध्याय में आयु का फलित
नौवें अध्याय में भाग्य और धर्म का फलित
दसवें अध्याय में कर्म का फलित
ग्यारवे अध्याय में लाभ और द्वितीय विवाह का
बारहवे अध्याय में हानि
तेरहवे अध्याय में दशा फल
चौदहवे अध्याय में शनि के फल का
पन्द्रहवें अध्याय में दीक्षा फल का वर्णन किया गया है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:07]
जीवन में कुछ श्रेष्ठ पाने के लिए अपना पात्रता सिद्ध करना पड़ता है आशा करता हूं आप सब अच्छे पात्र सिद्ध होंगे
Narain Singh Tanwar, [26.04.21 12:08]
👍
ज्योतिष सूत्रम सविता जी, [26.04.21 12:08]
🙏🙏
Raj, [26.04.21 12:08]
🙏🙏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:10]
जया मूली के ध्रुव अनाड़ी में ढाई लाख श्लोक हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:10]
सत्यचार्य के नाड़ी ग्रन्थ को सत्य संहिता के नाम से भी जाना जाता है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:11]
हम नाड़ी से फलित करने की सरल और सटीक विद्या आपको सिखाने का प्रयास करेंगे
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:11]
सूर्य, पितामह, व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीच, मनु, अंगिरा, रोमास, पौलिस, चवन, यवन, भृगु, सोनक आदि यह ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। कश्यप संहिता के अनुसार।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:15]
अब प्रश्न उठता है क्या हम इन महाऋषियों के प्रवर्तित ज्योतिष शास्त्र को जानते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:15]
क्या हम यह कह सकते हैं कि इनमें श्रेष्ठ कौन हैं। इस ब्रह्मांड में बिना प्रयोजन के कुछ भी रचना नहीं हुई है।
Shavinder Dogra, [26.04.21 12:19]
👏👏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:20]
पितामह ब्रह्मा द्वारा रचित ज्योतिष ग्रंथ पितामह सिद्धांत के नाम से जाना जाता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:23]
भगवान सूर्य रचित सूर्य सिद्धांत का नाम तो आप सब ने सुना ही होगा।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:23]
भगवान विष्णु के नाभि कमल से पितामह ब्रह्मा का जन्म हुआ ब्रह्माजी के मानस पुत्र का नाम मारीच है महाऋषि मारीच से कश्यप का जन्म हुआ। यह कश्यप ही सूर्य के पितामह है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:24]
यह समस्त ऋषि ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक हैं अर्थात हम कह सकते हैं कि पराशर जी के पूर्व भी ज्योतिष शास्त्र का वर्णन हो चुका था।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:26]
सूर्य सिद्धांत के 14 अध्याय हैं जिसमें सातवें अध्याय में सूर्य की युक्ति और गृह युद्ध के वर्णन मिलते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
त्रिस्कन्ध के आदि उपदेशक कार देव ऋषि नारद माने जाते हैं श्रीमद् भागवत में सूतजी नारद जी के विषय में कहते हैं की नारद जी ग्रह सिद्धांतों के ज्ञाता और ज्योतिष शास्त्र के श्रेष्ठ हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
देव ऋषि नारद जी द्वारा रचित सिद्धांत ग्रंथ में त्रिस्कन्ध ज्योतिष के विषय में स्पष्ट रूप से बताया गया है त्रिस्कन्ध ज्योतिष क्या है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
1 -- सिद्धांत स्कंध में योग, अंतर, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन, और घनमूल तथा ग्रह के स्पष्ट करने की विधि सिद्धांत दिए गए है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:30]
2-- होरा स्कंध में ग्रह के सील, पंचशील गुण, बल, दृष्टि, मैत्री आधान, लग्न, दशा, अंतर्दशा, भाव, प्रश्न, कुंडली जैसे जातक के संबंध में समस्त विषय जानकरी।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:31]
3-- सहित स्कंध में इसमें लगभग 750 श्लोक हैं इसमें ग्रह की गति, तिथि, नक्षत्र, करण, योग, मुहूर्त, गोचर, जैसे विषय पर देव ऋषि नारद जी ने उल्लेख किया है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:32]
गर्गाचार्य जी ने ज्योतिष तत्व मीमांसा नामक ग्रंथ की रचना की महाऋषि गर्गाचार्य वैदिक मंत्र दर्शी ऋषि थे।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:33]
ऋग्वेद के कई मंत्रों की रचना उनके द्वारा हुई है।
महाऋषि गर्गचार्य के नाम से कई ग्रंथ हैं जैसे गर्ग जातक, गर्ग मनोरमा, गर्ग संहिता,
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:34]
अब मैं महाऋषि पराशर के बारे में बताता हूं । महाऋषि पराशर, महात्मा वशिष्ठ के पुत्र अर्थात ऋषि शक्ति के पुत्र हैं।
वेदव्यास जी के पिता हैं।
पराशर शब्द का अर्थ है। जिनके दर्शन से हो समस्त पापों का नाश
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:34]
महऋषि पराशर जी द्वारा रचित
1--पराशर होरा शास्त्र
2--लघु पाराशरी
3-- मध्यपरा पराशरी।
4--कृषि पराशर ज्योतिष शास्त्र के अनमोल ग्रंथ है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:35]
महाऋषि पराशर -- एक बार की बात है जनक जी ने महर्षि पराशर जी के पास जाकर पूछा मैंने कौन सी ऐसी वस्तु है जो समस्त प्राणियों के लिए इसलोक और परलोक में भी कल्याणकारी है।
तब पराशर जी ने उन्हें जो धर्म ज्ञान और धर्म आचरण की बातें बताएं वह पराशर गीता के नाम से जाना जाता है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:36]
जिसका विवरण आपको महाभारत के शांति पर्व में मिल जाएगा अर्थात हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि महर्षि पराशर मात्र ज्योतिष ज्ञान ही नहीं परंतु सदाचार और अध्यात्म के लिए भी जाने जाते थे।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:37]
होरा शास्त्र पांच प्रकार के होते हैं ।
नंबर 1 जातक
नंबर दो ताजिक
नंबर 3 रमल
नंबर 4 प्रश्न
नम्बर 5 स्वप्न।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
होरा शास्त्र अत्यंत प्राचीन शास्त्र है नारद कश्यप वशिष्ठ और ऋषि इनके प्रवर्तक हैं ।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
पराशर जी के बाद
बृहद जातक के रचनाकार
बराहमिहिर
उनके पुत्र पृथू यस सारावली के रचनाकार।
कल्याण वर्मा जातक पद्धति के रचनाकार।
सौभाग्य जातक अलंकार के रचनाकार गणेश देवाग्य ।
भाव कुतूहल के रचनाकार जीवनाथ।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
होरा रत्न के बलभद्र।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:40]
आज के लिए इतना ही।मिलते है कल की क्लास में आगे के अध्ययन के साथ।आप सब का धन्यवाद।
विषय ज्ञान कैसा लगा अपने विचार अवश्य दे।
Shavinder Dogra, [26.04.21 12:41]
बहुत सुन्दर प्रस्तुति👏👏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:41]
धन्यवाद🙏🙏 आगे भी इसी प्रकार आप सब का स्नेह मील इसकी ही आकांशा है।
🌹🌹 *ॐ*🌹🌹
*वक्रतुंड महाकाय कोटी सूर्य समप्रभा ।।*
*निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।*
परिवार में उपस्थित सभी सदस्यों का स्वागत है।🌹🌹
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:41]
अब थोड़ा कुंडली चक्र के बारे में जान लेते है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:42]
कुंडली वह चक्र है, जिसके द्वारा किसी इष्ट काल में राशिचक्र की स्थिति का ज्ञान होता है। राशिचक्र क्रांतिचक्र से संबद्ध है, जिसकी स्थिति अक्षांशों की भिन्नता के कारण विभिन्न देशों में एक सी नहीं है। अतएव राशिचक्र की स्थिति जानने के लिये स्थानीय समय तथा अपने स्थान में होनेवाले राशियों के उदय की स्थिति (स्वोदय) का ज्ञान आवश्यक है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:45]
हमारी घड़ियाँ किसी एक निश्चित याम्योत्तर के मध्यम सूर्य के समय को बतलाती है। इससे सारणियों की, जो पंचागों में दी रहती हैं, सहायता से हमें स्थानीय स्पष्टकाल ज्ञात करना होता है। स्थानीय स्पष्टकाल को इष्टकाल कहते हैं। इष्टकाल में जो राशि पूर्व क्षितिज में होती है उसे लग्न कहते हैं। तात्कालिक स्पष्ट सूर्य के ज्ञान से एवं स्थानीय राशियों के उदयकाल के ज्ञान से लग्न जाना जाता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:48]
लग्न को प्रथम भाव तथा उसके बाद की राशि को दूसरे भाव इत्यादि के रूप में कल्पित करते हैं1 भावों की संख्या उनकी कुंडली में स्थिति से ज्ञात होती है। राशियों का अंकों द्वारा तथा ग्रहों को उनके आद्यक्षरों से व्यक्त कर देते हैं। इस प्रकर का राशिचक्र कुंडली कहलाता है। भारतीय पद्धति में जो सात ग्रह माने जाते हैं, वे हैं सूर्य, चंद्र, मंगल आदि।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:52]
इसके अतिरिक्त दो तमो ग्रह भी हैं, जिन्हें राहु तथा केतु कहते हैं। राहु को सदा क्रांतिवृत्त तथा चंद्रकक्षा के आरोहपात पर तथा केतु का अवरोहपात पर स्थित मानते हैं। ये जिस भाव, या जिस भाव के स्वामी, के साथ स्थित हों उनके अनुसार इनका फल बदल जाता है। स्वभावत: तमोग्रह होने के कारण इनका फल अशुभ होता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:53]
पाश्चात्य प्रणाली में (1) मेष, (2) वृष, (3) मिथुन, (4) कर्क, (5) सिंह, (6) कन्या, (7) तुला, (8) वृश्चिक, (9) धनु, (10) मकर, (11) कुंभ तथा (12) मीन राशियों के लिये क्रमश: निम्नलिखित चिह्न हैं : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:55]
(1) बुध, (2) शुक्र, (3) पृथ्वी, (4) मंगल, (5) गुरु, (6) शनि, (7) वारुणी, (8) वरुण, तथा (9) यम ग्रहों के लिये क्रमश: निम्नलिखित चिह्न : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 तथा सूर्य के लिये और चंद्रमा के लिये प्रयुक्त होते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:57]
भावों की स्थिति अंकों से व्यक्त की जाती है। स्पष्ट लग्न को पूर्वबिंदु (वृत्त को आधा करनेवाली रेखा के बाएँ छोर पर) लिखकर, वहाँ से वृत्त चतुर्थांश के तुल्य तीन भाग करके भावों को लिखते हैं। ग्रह जिन राशियों में हो उन राशियों में लिख देते हैं। इस प्रकार कुंडली बन जाती है, जिसे अंग्रेजी में हॉरोस्कोप कहते हैं। यूरोप में, भारतीय सात ग्रहों के अतिरिक्त, वारुणी, वरुण तथा यम के प्रभाव का भी अध्ययन करते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 11:58]
अब थोड़ा नाड़ी का परिचय नाड़ी ग्रंथों का परिचय
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:01]
काका भुजान्दर नाड़ी, वशिष्ट नाड़ी, ईश्वर नाड़ी, चंद्रकला नाड़ी, ध्रुव नाड़ी, भृगु नाड़ी, नंदी नाड़ी पुल्लीपानी नाड़ी, सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी, कुंज नाड़ी, बुध नाड़ी, गुरु नाड़ी, शुक्र नाड़ी, शनि नाड़ी, लग्न नाड़ी, लगनाधिपति नाड़ी, सत्य नाड़ी, अगस्त नाड़ी, सप्त ऋषि नाड़ी ,ईश्वर नाड़ी आदी शामिल है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:01]
चन्द्रकला नाड़ी में इन सभी नाड़ियों का कुछ कुछ अंश शामिल है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:02]
ताड पत्र पर अंगूठे के निशान से जो विचार किया जाता था है उसमें 15 चैप्टर हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:07]
पहले अध्याय में साधारण जानकारी है
दूसरे अध्याय में धनो परिवार का फलित
तीसरे अध्याय में भाई-बहन और साहस का फलित
चौथे अध्याय में माता और सुख का फलित
पांचवे अध्याय में संतान का फलित
छठे अध्याय में रेड और शत्रु का फलित
सातवें अध्याय में विवाह का फलित
आठवें अध्याय में आयु का फलित
नौवें अध्याय में भाग्य और धर्म का फलित
दसवें अध्याय में कर्म का फलित
ग्यारवे अध्याय में लाभ और द्वितीय विवाह का
बारहवे अध्याय में हानि
तेरहवे अध्याय में दशा फल
चौदहवे अध्याय में शनि के फल का
पन्द्रहवें अध्याय में दीक्षा फल का वर्णन किया गया है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:07]
जीवन में कुछ श्रेष्ठ पाने के लिए अपना पात्रता सिद्ध करना पड़ता है आशा करता हूं आप सब अच्छे पात्र सिद्ध होंगे
Narain Singh Tanwar, [26.04.21 12:08]
👍
ज्योतिष सूत्रम सविता जी, [26.04.21 12:08]
🙏🙏
Raj, [26.04.21 12:08]
🙏🙏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:10]
जया मूली के ध्रुव अनाड़ी में ढाई लाख श्लोक हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:10]
सत्यचार्य के नाड़ी ग्रन्थ को सत्य संहिता के नाम से भी जाना जाता है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:11]
हम नाड़ी से फलित करने की सरल और सटीक विद्या आपको सिखाने का प्रयास करेंगे
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:11]
सूर्य, पितामह, व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, पराशर, कश्यप, नारद, गर्ग, मरीच, मनु, अंगिरा, रोमास, पौलिस, चवन, यवन, भृगु, सोनक आदि यह ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। कश्यप संहिता के अनुसार।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:15]
अब प्रश्न उठता है क्या हम इन महाऋषियों के प्रवर्तित ज्योतिष शास्त्र को जानते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:15]
क्या हम यह कह सकते हैं कि इनमें श्रेष्ठ कौन हैं। इस ब्रह्मांड में बिना प्रयोजन के कुछ भी रचना नहीं हुई है।
Shavinder Dogra, [26.04.21 12:19]
👏👏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:20]
पितामह ब्रह्मा द्वारा रचित ज्योतिष ग्रंथ पितामह सिद्धांत के नाम से जाना जाता है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:23]
भगवान सूर्य रचित सूर्य सिद्धांत का नाम तो आप सब ने सुना ही होगा।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:23]
भगवान विष्णु के नाभि कमल से पितामह ब्रह्मा का जन्म हुआ ब्रह्माजी के मानस पुत्र का नाम मारीच है महाऋषि मारीच से कश्यप का जन्म हुआ। यह कश्यप ही सूर्य के पितामह है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:24]
यह समस्त ऋषि ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक हैं अर्थात हम कह सकते हैं कि पराशर जी के पूर्व भी ज्योतिष शास्त्र का वर्णन हो चुका था।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:26]
सूर्य सिद्धांत के 14 अध्याय हैं जिसमें सातवें अध्याय में सूर्य की युक्ति और गृह युद्ध के वर्णन मिलते हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
त्रिस्कन्ध के आदि उपदेशक कार देव ऋषि नारद माने जाते हैं श्रीमद् भागवत में सूतजी नारद जी के विषय में कहते हैं की नारद जी ग्रह सिद्धांतों के ज्ञाता और ज्योतिष शास्त्र के श्रेष्ठ हैं।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
देव ऋषि नारद जी द्वारा रचित सिद्धांत ग्रंथ में त्रिस्कन्ध ज्योतिष के विषय में स्पष्ट रूप से बताया गया है त्रिस्कन्ध ज्योतिष क्या है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:29]
1 -- सिद्धांत स्कंध में योग, अंतर, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन, और घनमूल तथा ग्रह के स्पष्ट करने की विधि सिद्धांत दिए गए है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:30]
2-- होरा स्कंध में ग्रह के सील, पंचशील गुण, बल, दृष्टि, मैत्री आधान, लग्न, दशा, अंतर्दशा, भाव, प्रश्न, कुंडली जैसे जातक के संबंध में समस्त विषय जानकरी।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:31]
3-- सहित स्कंध में इसमें लगभग 750 श्लोक हैं इसमें ग्रह की गति, तिथि, नक्षत्र, करण, योग, मुहूर्त, गोचर, जैसे विषय पर देव ऋषि नारद जी ने उल्लेख किया है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:32]
गर्गाचार्य जी ने ज्योतिष तत्व मीमांसा नामक ग्रंथ की रचना की महाऋषि गर्गाचार्य वैदिक मंत्र दर्शी ऋषि थे।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:33]
ऋग्वेद के कई मंत्रों की रचना उनके द्वारा हुई है।
महाऋषि गर्गचार्य के नाम से कई ग्रंथ हैं जैसे गर्ग जातक, गर्ग मनोरमा, गर्ग संहिता,
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:34]
अब मैं महाऋषि पराशर के बारे में बताता हूं । महाऋषि पराशर, महात्मा वशिष्ठ के पुत्र अर्थात ऋषि शक्ति के पुत्र हैं।
वेदव्यास जी के पिता हैं।
पराशर शब्द का अर्थ है। जिनके दर्शन से हो समस्त पापों का नाश
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:34]
महऋषि पराशर जी द्वारा रचित
1--पराशर होरा शास्त्र
2--लघु पाराशरी
3-- मध्यपरा पराशरी।
4--कृषि पराशर ज्योतिष शास्त्र के अनमोल ग्रंथ है।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:35]
महाऋषि पराशर -- एक बार की बात है जनक जी ने महर्षि पराशर जी के पास जाकर पूछा मैंने कौन सी ऐसी वस्तु है जो समस्त प्राणियों के लिए इसलोक और परलोक में भी कल्याणकारी है।
तब पराशर जी ने उन्हें जो धर्म ज्ञान और धर्म आचरण की बातें बताएं वह पराशर गीता के नाम से जाना जाता है
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:36]
जिसका विवरण आपको महाभारत के शांति पर्व में मिल जाएगा अर्थात हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि महर्षि पराशर मात्र ज्योतिष ज्ञान ही नहीं परंतु सदाचार और अध्यात्म के लिए भी जाने जाते थे।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:37]
होरा शास्त्र पांच प्रकार के होते हैं ।
नंबर 1 जातक
नंबर दो ताजिक
नंबर 3 रमल
नंबर 4 प्रश्न
नम्बर 5 स्वप्न।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
होरा शास्त्र अत्यंत प्राचीन शास्त्र है नारद कश्यप वशिष्ठ और ऋषि इनके प्रवर्तक हैं ।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
पराशर जी के बाद
बृहद जातक के रचनाकार
बराहमिहिर
उनके पुत्र पृथू यस सारावली के रचनाकार।
कल्याण वर्मा जातक पद्धति के रचनाकार।
सौभाग्य जातक अलंकार के रचनाकार गणेश देवाग्य ।
भाव कुतूहल के रचनाकार जीवनाथ।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:38]
होरा रत्न के बलभद्र।
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:40]
आज के लिए इतना ही।मिलते है कल की क्लास में आगे के अध्ययन के साथ।आप सब का धन्यवाद।
विषय ज्ञान कैसा लगा अपने विचार अवश्य दे।
Shavinder Dogra, [26.04.21 12:41]
बहुत सुन्दर प्रस्तुति👏👏
DDHEERAJ Pndey, [26.04.21 12:41]
धन्यवाद🙏🙏 आगे भी इसी प्रकार आप सब का स्नेह मील इसकी ही आकांशा है।
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